Manoj Bhawuk

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Bhojpuri Poet, Writer, and Film-critic.

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Tasveer Jindigi Ke

Collection of Gazals written by Manoj Bhavuk

अतने में बा समूचा तस्वीर जिन्दगी के

- सत्यनारायण

ई अजब संयोग बा. पिछला पचीस-तीस बरिस से थोक भाव से गजल कहा (लिखा) रहल बा. नया त नया, बड़-बुजुर्ग कवि लोगन में भी गजल कहे के ललक बढ़ल चल जाता. हमार भोजपुरी साहित्य भी एह से बाँचल नईखे. नतीजा ई कि गजल का नाम पर ढेर अखोर-बखोर पढ़े सुने के मिल रहल बा. गजलन में भरती के शेर, शेरन में भरती के शब्द, उल्टा-पुल्टा रदीफ-काफिया के साथे कथ्य के भंगिमा (अन्दाजे-बयानी) के जगहा सपाट बयानी - कुल मिला के स्थिति अराजक हो रहल बा. बाकिर, देखा-देखी के अतिरेक में अइसन होला. तबहियों थोक के भाव से गजल लिखनिहार लोग के बात छोड़ देल जाय, त भोजपुरी में भी कुछ दमदार गजल लिखाईल बा आ लिखा रहल बा. एह दृष्टि से जगन्नाथ, पाण्डेय कपिल, कैलाश गौतम, भगवती प्रासाद द्विवेदी, संधिदूत, अशोक द्विवेदी, रामेश्वर प्रसाद सिन्हा जइसन रचनाकारन के नाम विश्वास के साथ लिहल जा सकेला. जगन्नाथ जी त एह दिशा में ऐतिहासिक काम कइले बाड़े. रचनात्मक अनुशासन के साथ गजल लिखे के अलावे गजल के शिल्प आ स्वरूप पर बड़ा ठोस काम कइले बाड़े.

हमरा प्रसन्नता बा कि अपना पहिला गजल-संग्रह 'तस्वीर जिन्दगी के' के माध्यम से युवा कवि मनोज 'भावुक' भी एह पाँत में शामिल हो रहल बाड़े. अपना साठ गजलन में भावुक काफी हद तक गजलियत के निर्वाह कइले बाड़े. इनका में खाली गजल के ढाँचा भर नइखे. कथ्य के भंगिमा के साथ-साथ इहाँ सादगी आ मासूमियत भी जगह-जगह देखल जा सकेला.

'मैं और मेरी शायरी' शीर्षक अपना आलेख में 'फिराक' साहेब साफ लिखले बाड़े - "मैंने अपनी रचनाओं में यही प्रयास किया है कि हम काव्यात्मक और कलात्मक चेतना से, मन और विवेक से ऐसे अनुभव प्राप्त कर सकें जिसमें संसार से अलग किसी खुदा, ईश्वर, महाजन, पूजा-पाठ, सिज्दा-दण्डवत, या साम्प्रदायिकता का कोइ स्थान न हो. " अपना एक इण्टरव्यू में 'फिराक' एह बात के गम्भीरता से खुलासा कइले बाड़े - "मेरी आन्तरिक या अज्ञात प्रेरणा यह थी कि उर्दू साहित्य में भारतीय संस्कृति की शुद्धतम और वास्तविक प्रेरणायें एक नयी चेतना प्रदान करें और इस तरह उर्दू साहित्य में एक नई चेतना जन्म ले और स्थापित हो जाये....पहले तो कुछ लोग बिदके. कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया कि फिराक उर्दू के लिये एक मुस्तकिल खतरा है और उर्दू की आत्मा का भारतीयकरण कर रहा है. मुस्लिम कल्चर बहुत ऊँची चीज है, मगर उसमें प्रकृति, बाल-जीवन, नारीत्व का चित्रण या घरेलू जीवन की बू-बास नहीं मिलती, वे जादू भरे भेद नहीं मानते, जो हिन्दू कल्चर में हमें मिलते हैं. " इहे कारण बा कि 'फिराक' साहेब के लिखे के पड़ल-

इन्सान का सफर है, अबद औ' अजल के बीच
आवाजे-पा सुनेंगे उसीकी गजल के बीच
है रौशनी उसी की, सरे राह जीस्तो मर्ग
शायर है एक चिराग हयातो अजल के बीच

'फिराक' के उपरोक्त वक्तव्य के इहाँ उल्लेख करे ई मतलब ना हऽ कि हम उनुका के समानान्तर रख के 'भावुक' के महिमामण्डित करे के चाहत बानी. कवि के रचना-संसार में एकर झलक पहचाने के कोशिश बा. 'तस्वीर जिन्दगी के' में 'भावुक' जे कुछ कहले बाड़े, ऊ बहुत हद तक उनुका मन अउर विवेक अर्थात भावना अउर प्रज्ञा से प्राप्त अनुभव के समीकरण हऽ. एह संग्रह में जिन्दगी पर कई गो शेर कहाइल बा. इहाँ तीन गजलन के एक-एक शेर देखल जा सकेला -

गोदी से ले के डोली, डोली से ले के अर्थी
अतने में बा समूचा तस्वीर जिन्दगी के
(गजल संख्या ७)

बहुत नाच जिनिगी नचावत रहल
हँसावत, खेलावत, रोआवत रहल
(गजल संख्या २७)

जिन्दगी के भईल रहे बीमा
होत बा लाश के हिसाब, ऐ दोस्त
(गजल संख्या २५)

ई कहे के जरूरत ना होखे का चाहीं कि पहिलका दू शेरन में जिन्दगी के सम्पूर्णता में देखे के भरपूर कोशिश बा. एह शेरन के 'भावुक' बड़ा सादगी आ मासूमियत से कहले बाड़े, जे गजल के जरूरी शर्त हऽ. बात गोदी से डोली, आ डोली से अर्थी तक, मतलब जिन्दगी के विस्तार. बाकिर, एह विस्तार के बड़ा सादगी आ भोलापन के साथ अतने कह के समेट ले ले बाड़े 'अतने में बा समूचा तस्वीर जिन्दगी के'. ई गजलियत के रचनात्मक विवेक हऽ. दोसरका शेर में भी इहे सादगी बा. 'हँसावत, खेलावत, रोआवत' में मीठा-कड़वा सच्चाई एकदम सहजता से कहाइल बा. तिसरका शेर व्यंग्य के पीड़ा से उपजल बा. एह सिलसिला में एगो शेर इयाद पड़त बा -

अजीब लोग है, कब्रों पे जान देते हैं
सड़क की लाश का तो कोइ दावेदार नही

घरेलू जिन्दगी के अँजोर-अन्हार, सुख-दुख, राग-विराग पर भी 'भावुक' के नजर बा. एह सन्दर्भ में सैतालिसवाँ गजल के ई शेर देखल जा सकेला -

बनल रहे घर, बँटे ना आँगन
एही से सभकर सहेले माई

.... ..... ...... ..... ..... ...

बढ़े उदासी हिया में जब-जब
बहुत-बहुत मन, परेले माई

एह शेरन के तरल तलस्पर्शी संवेदना सहजे मर्म तक पँहुच जाता.

'भावुक' आज के भयावह आ हिंसक यथार्थ से अनजान होखस, अइसन नइखे. आज के रचना-कर्म के ई तकाजा हऽ कि आदमी आ समाज जे लगातार संवेदनहीन हो रहल बा, ओहमें अपना रचना से सीधा हस्तक्षेप करे. 'भावुक' रचना-कर्म में सजग बाड़े.

बदलाव के उठल बा अइसन ना तेज आन्ही
कहवाँ ई गोड़ जाता, कुछुओ बुझात नइखे
(गजल संख्या १२)

संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा
मालूम ना, ई लोग के कइसे सहात बा
(गजल संख्या १४)

हर सचेत व्यक्ति के तरह 'भावुक' भी परेशान बाड़े कि आज के निरंकुश आ हिंसक सत्ता के विरोध में लोग खुल के काहे नइखे आवत. बाकिर कवि निराश आ हताश नइखे.

कबहूँ त भोर होई, कबहूँ छँटी कुहासा
'भावुक' ई मान लऽ तू आगे अन्हार नइखे
(गजल संख्या १९)

कवि कथ्य के भंगिमा के चलते भी आकृष्ट कर रहल बा. यथा -

रंग चेहरा के बा उड़ल काहें
चोर मन के धरा गइल बा का ?
(गजल संख्या १६)

'भावुक' छोट बहर के गजल भी सफलता के साथ लिखले बाड़े. छोट बहर के साधल बड़ा कठिन होला. संकलन के एकतालिसवाँ गजल में छोट बहर के निर्वाह गजलियत के साथ अभिव्यक्ति के तिर्यक-भंगिमा में बखूबी देखल जा सकेला -

का बा तहरा-हमरा में
जिनिगी प्रेम-ककहरा में

संग्रह के पढ़े के क्रम में प्रेमानुभूति के गजलन से हम आश्वस्त ना हो सकलीं. कवि में अलग ढंग से कुछ कहे के कोशिश ना दिखाई पड़ल. बाकिर हम एतना जरूर कह सकीले कि मनोज 'भावुक' में दृष्टि बा, छन्द-बहर के ज्ञान बा अउर काव्य-संवेदना के पहचान बा.

आखिर में 'भावुक' के एक शेर (जे हमरा जेहन में पइठ गइल बा) उद्धृत करे के चाहत बानीं -

रोज पीछा करीले हम, बाकिर
रोज बढ़ जाला आसमाँ आगे

हम कामना करत बानी कि मनोज 'भावुक' एही तरे आसमान के पीछा करत रहस अउर काव्य-अभियान में ई उक्ति चरितार्थ हो सके - Sky is the limit.

हमार शुभकामना. हमार आशीर्वाद !


डी ब्लाक, कदमकुआँ, पटना - 800003