Home | Back
फिल्म-निर्माता मोहन जी प्रसाद से मनोज भावुक के बात-चीत
मोहन जी प्रसाद भोजपुरी सिनेमा के एगो श्रेष्ठ निर्माता के नाम ह। हालाँकि फिल्म निर्माण के साथे-साथ निर्देशन, पटकथा-लेखन आ फिल्म वितरण के कारोबार से भी इहाँ के संबन्धित बानी। बाकिर इहाँ के पहचान एगो श्रेष्ठ निर्माता के रूप में ही बा। हिन्दी भोजपुरी के अलावे इहाँ के बंगला में भी फिल्म बनवले बानी। तीन बार CINE GOERS AWARD आ फिल्मी लाइन के अन्य कई पारितोषिक से सम्मानित निर्माता मोहन जी प्रसाद के हिन्दी फिचर फिल्म 'घर-द्वार ' आ भोजपुरी फीचर फिल्म 'हमार भउजी' सिल्वर जुबली मना चुकल बा।
हाल ही में मोहन जी के बेहतरीन भोजपुरी फिल्म बनावे खातिर 'नाजिर हुसैन पुरस्कार' से नवाजल गइल। आ बेस्ट फिल्म के पुरस्कार भी मोहन जी निर्मित फिल्म ' पंडित जी बताईं ना बियाह कब होई' के दीहल गइल । आज के सुपर स्टार रवि किशन के गाड फादर हईं मोहन जी प्रसाद।मोजन जी प्रसाद के 'सइयां हमार ' से रवि किसन के इंट्री भइल भोजपुरी सिनेमा मे। आजकल मोहन जी प्रसाद रवि किशन आ स्टार प्लस के चर्चित धारावाहिक 'कसौटी जिन्दगी की' के हिरोइन श्वेता तिवारी के लेके 'हमार संइया हिन्दुस्तानी' बनावे में व्यस्त बानी।
आज से चार साल पहिले 'संइया से कर द मिलनवा हे राम' के सेट पर मोहन जी से आ उनका फिल्म के हीरो रवि किशन, चरित्र अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर, अभिनेत्री रेखा सहाय आदि स्टार से हमरा भेंट मुलाकात आ बातचीत भइल।
हम कमलिस्तान,मुंबई, सेट पर पहुँचनी त शूटिंग चलत रहे। मोहन जी निर्देशन में व्यस्त रहीं।
' बेगम तनी दू जगह नाश्ता ले आव । '
' ह त आप लोग कहाँ से आये हैं?'
' रामपुर से '
' अरे वहाँ के थाने में तो हम कई साल थानेदार रहे हैं। और आप मोहतरमा'
..........कट......कट......कट
हिन्दी सिनेमा के मशहूर कलाकार सदाशिव अमरापुरकर के भोजपुरी सिनेमा के सेट पर देख के एक साथे कई गो प्रश्न उठल। ....खैर सदाशिव जी से हम एकही सवाल कइनी- '' जब एगो दोसरा भाषा के कलाकार दोसरा भाषा के फिल्म में काम करेला त ओकरा सामने मुख्य समस्या का होला?''सदाशिव जी मुस्कुरइनी। ई मुस्कुराहट देख के फिल्मी पर्दा पर के उहाँ के खलपात्र के छवि हमरा मन से छू मंतर हो गइल। उहाँ के कुछ बोलीं एकरा पहिलहीं सेट पर उहाँ के बोलाहट हो गइल । ..... जब हम सेट पर पहुंचल रहीं त सदाशिव जी ( थानेदार) के साथे रविकिशन ( मुख्य हिरो) आ रुपाली ( नायिका) पर उक्त दृश्य फिल्मावल जात रहे।
निर्देशन के व्यस्तता के बावजूद मोहन जी भोजपुरिया मन-मिजाज से हमनी के स्वागत कइनी आ फेर शूटिंग मे बाझ गइनी।
थोरहीं देर बाद भोजपुरी फिल्म ' गंगा-ज्वाला' के नायिका रेखा सहाय भी एगो घायल महिला के मेक-अप मे सेट पर अइली। उनका के हम आपन परिचय दिहनी आ अपना किताब ' भोजपुरी सिनेमा के विकास-यात्रा' खातिर बात-चीत करें के मनसा जाहिर कइनी। मन त उनको भइल बाकिर शूटिंग के ओह हबाहबी में केहू से ठीक से बात-चीत ना हो सकल। अइसहूँ शूटिंग के समय कलाकार अपना काम के मूड मे रहेला, एह से ओकरा के या शूटिंग के डिस्टर्ब कइल ठीक ना ह। इहे सोची के हम आपन मन खींच लेनी। रेखा जी भी आपन पता आ फोन न0 देत कहली कि कबो घरे आईं त ढंग से बात-चीत होई। सूर्यास्त हो गइल रहे। हमरो जल्दिबाजी रहे। हम मोहन जी से काल्ह फिल्म-सिटी ( गोरेगाँव ) मे मिले के वादा क के वापस अपना कुटिया में लौट अइनी।
बिहान भइला जब हम अपना छोट भाई धर्मेन्द्र के साथे फिल्म- सिटी खातिर चलनी त हवा कहे कि हमहीं रहब आ पानी कहे कि हमहीं रहब ।
फिल्म सिटी तक पहुंचत - पहुंचत हमनी के आधा भींज गइल रहनी जा। शाम के तीन बज गइल रहे। नियत समय से एक घंटा लेट रहीं, हम। मोहन जी दू बजे के टाइम दीहले रहनी।......सेट पर पहुँचनी त गाना के शूटिंग होत रहे। गाना रवि किशन जी पर फिल्मावल जात रहे। तबूना के संगीत पर कुमार सानू के आवाज में विनय बिहारी लिखित गीत- 'कागज प कबो कबो धरती पर हम उनकर नाम लिखत बानी'.... बाजत रहे आ रविकिशन जी कबो पांक में लोटाईं त कबो बालू पर अपना प्रेमिका के नाम लिखीं।
जौनपुर के रहनिहार रविकिशन जी लगभग ढाई दर्जन हिन्दी फिल्म आ दर्जनों हिन्दी सीरियल में आपन जौहर देखवला के बाद 'संइया हमार' से भोजपुरी सिनेमा में बतौर मुख्य नायक प्रवेश क गइल बानी। गीत फिल्मांकन के बाद इनका फुरसत मिलल त 'संइया हमार' आ 'संइया से कर द मिलनवा हे राम' के अलावे भोजपुरी सिनेमा के संदर्भ में कुछ बात-चीत भइल।रविकिशन जी के कहनाम बा कि 'उत्तर प्रदेश आ बिहार राजनीति के अखाड़ा ह। सबसे जादा राजनेता इहवें पैदा भइल बाड़न। एह दूनू राज्यन के गाँव में राजनीति पैदा होले। तबहूँ 'राजनीति' पर केन्द्रित एकहू फिल्म (भोजपुरी फिल्म) नइखे बनल। अधिकांश फिल्म भइया-भउजी, चाची-काकी, अंगना-दुआर में नाचत रहल बा।'
रविकिशन जी के बात गौर करें लायक बा। अभी बात-चीत चलते रहे कि स्टूडियो से लौट के मोहन जी आ गइनी। मौसम के मिजाज देखि के उहाँ के दूसरा पाली (रात के) के शूटिंग स्थगित क देनीं। फिल्म सिटी चारों तरफ से करिया बदरी से घिरल रहे। झिमिर-झिमिर फुहार पड़त रहे। पैक अप के बाद हमनी मोहन जी के गाड़ी पर सवार हो गइनी जा, आ फिल्म विषयक बात-चीत करत उनका आवास पर पहुँच गइनी जा। बांद्रा स्टेशन से थोड़ही दूर पर नर्गिस दत्त रोड पर 'मंजू महल' बा। ई महल मोहन जी के ह। एही महल में बइठ के भोजपुरी सिनेमा का संदर्भ में मोहन जी से घंटन बात-चीत भइल ।
प्रस्तुत बा बात-चीत के मुख्य अंश-
भावुक- मोहन जी, हम पीछला दू बरिस में कई गो फिल्म स्टार आ सुपर फिल्मकार लोग से भेंट मुलाकात कइनी ह। ऊ लोग भोजपुरी सिनेमा के वर्तमान स्थिति से निराश बा। ओह लोग के कहनाम बा कि ' अब भोजपुरी सिनेमा के बाजार उड़से-उड़से के कागार पर बा'। राउर का कहनाम बा।
मोहन जी - देखीं, पहिला बात कि भोजपुरी सिनेमा के वर्तमान स्थिति से हम तनिको निराश नइखीं। निराश भइल भा हथियार डाल दीहल कवनो समस्या के समाधान ना ह। अइसन स्थिति में त अउरो जोर-शोर से काम करें के चाहीं। अनुकूल परिस्थिति में त सभे चलेला। तुफान में चल के देखाईं तब नू?.... हम तनिको निराश नइखीं। निराश रहितीं त एह परिस्थिति में दू गो भोजपुरी फिल्म के निर्माण ना करितीं। एह में कवनो संदेह नइखे कि माहौल तनि खराब भइल बा, त एकरो खातिर उहे लोग दोषी बा, जे आधा मन से, बिना लगन के, बिना कवनो भावना के खाली पइसा कमाये खातिर अलूल जलूल कुछुओ बनावेला। हमरा विश्वास बा कि जदि लगन से, सही भावना से फिल्म बनावल जाय त सफलता जरूर मिली। भोजपुरी सिनेमा के बाजार उड़से के कल्पना निराधार आ बेतुका बा।
भावुक- त का ई मान लिहल जाय कि रउरा पइसा कमाये खातिर फिल्म नइखीं बनावत?
मोहन जी- बनावत बानी बाकिर खाली पइसा कमाये खातिर नइखीं बनावत।.... कमाये खातिर त हम हिन्दियो फिल्म बनवले बानी आ बनावत बानी। पइसा उहँवो कमा सकेनी। ओकर व्यापक क्षेत्र बा। तबहूँ भोजपुरी फिल्म बनावत बानी, काहे?.... उहो प्रतिकूल परिस्थिति में.... सिर्फ अपना मातृभाषा के प्रति प्रेम का चलते। अपना बोली में कुछ अलग हटि के करें के जूनून के चलते। आजुवो हिन्दी फिल्म निर्माण के प्रति हमार रूझान जादा बा। बावजूद एकरा बीच-बीच में भोजपुरी फिल्म बनिये जाता। खाली भोजपुरी का प्रति सेंटिमेट का चलते। हमार घर छपरा(रिविलगंज) ह। भोजपुरी माटी के गंध हमरा मन-प्राण में रचल बसल बा। एकरा संस्कृति, रहन-सहन, भाषा के हमरा जानकारी बा। एह से एह भाषा में फिल्म बनावल हमरा खातिर सहज आ आसान बा। हम एह भाषा के दर्शक से परिचित बानी। ओकर रिक्वायरमेंट आ डिमांड समझत बानी। कैमरा के हमरा ज्ञान बा। एही से हम अपना क्षेत्र के लोग के पसन्द के हिसाब से कहानी के ताना बाना बुनि के कैमरा में कैद कइले बानी। शायद रउरा मालूम होई कि 'संइया हमार' आ ;संइया से कर द मिलनवा हाय राम' दूनू के स्क्रिप्ट हमरे ह। हम फिल्म बनावत बानी दूइये गो चीज पर विशेष ध्यान देनी- पहिला कहानी आ दूसरा गीत। क्षेत्रिय फिल्म खातिर कहानी दमदार भइल त एकदम जरूरी बा। काहें कि क्षेत्रिय फिल्म में लंगटे-उघारे लइकी त देखावल नइखे जा सकत, स्विटजरलैण्ड त देखावल नइखे जा सकत। तब क्षेत्रिय फिल्म मेकर के ई मजबूरी होला कि स्क्रिप्ट सशक्त होखे। गाना बढ़िया होखे। ई बेसिक नीड्स ह। फेर खूबसूरती से फिल्मांकन कइल जाय।
अच्छा चीज बनाइब त लोग पसंद करी। जब-जब अच्छा मूवी बनल बा इतिहास गवाह बा लोग पसंद कइले बा। (हंसत) हमरा से केहू के दुश्मनी थोड़े बा, जे लोग हमार ना पसंद करी । हम लागल बानी इहे हमरा बस में बा। आगे भगवान के मर्जी।
भावुक- मोहन जी , सन ई. 1987 में भोजपुरी चलचित्र संघ के स्थापना भइल। रउरा ओकर अघ्यक्ष (कार्यकारिणी समिति के ) रहीं। का उद्देश्य रहे, ओह संस्था के आ कहाँ तक सफलता मिलल।
मोहन जी- भावुक जी ,रउरा पुराना जख्म कुरेद देनी। बड़ी मेहनत से आ मन से ऊ संस्था खड़ा भइल रहे। संस्था मे भोजपुरी फिल्म के हरेक पक्ष से जुड़ल लोग के समावेश रहे । सुजीत कुमार (वरिष्ठ उपाध्यक्ष), कांत कुमार (उपाध्यक्ष), देवनाथ सिंह (कोषाध्यक्ष), पद्मा खन्ना (सह सचिव), चाँद मिश्रा (सह सचिव), संगीतकार नौशाद, बद्री प्रसाद, विनय सिन्हा, युनुस परवेज, बाबूभाई दीक्षित, हरि शुक्ला, राम सिंह, वन्दिनी मिश्रा...... अरे केकर केकर नाम गिनाईं। महासचिव आलोक रंजन सक्रिय सूत्रधार रहले एह संस्था के। बड़ी उम्मीद रहे एह संस्था से।भोजपुरी चलचित्र संघ के स्थापना के उद्देश्य रहे - उत्कृष्ट भोजपुरी फिल्म के निर्माण, फिल्म निर्माण आ प्रदर्शन में आवे वाला कठिनाई से निर्माता के छुटकारा दिलवावल आ फिल्म के पक्ष से जुड़ल लोगन के ऊ तमाम सुविधा मुहैया करावल जवन कि अन्य प्रादेशिक भाषा के फिल्म से जुड़ल लोग के प्राप्त बा।
बाकिर सब सपना चूर-चूर हो गइल।
भावुक- अइसन का हो गइल!
मोहन जी- आम के टोकरी में एगो सड़ल आम पड़ गइल।
भावुक- नाम....
मोहन जी- जाये दीं। जे भी रहे, अच्छा ना कइल। इहवा यू.पी. आ बिहारवाद आ गइल। क्षेत्रवाद संस्था के खा गइल। संस्था कागजी होके रह गइल। काम कुछुवो ना हो सकल। सब मेहनत पर पानी फिर गइल।
भावुक- मोहन जी, भोजपुरी फिल्म के विकास में सबसे बड़ बाधा का बा?
मोहन जी- सरकार के असहयोग आ अनिच्छा। भोजपुरी भाषी जनता में अपना मातृभाषा के प्रति हीन भावना। सबसे बड़ बाधा इहे बा।
हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार में तनि सुगबुगाहट भइल बा बाकिर बिहार अभी सुतले बा। दुर्भाग्य के बात बा कि बिहार में भोजपुरी भाषी मुख्यमंत्री के रहला के बादो भोजपुरी फिल्मनि के घोर उपेक्षा हो रहल बा।
जइसे दोसरा प्रदेश के सरकार अपना प्रादेशिक भाषा में बनेवाली फिल्म के मनोरंजन कर एगो निश्चित अवधि खातिर माफ क देले, रियायती दर पर तकनीकि उपकरण आ सामग्री उपलब्ध करावेले.... इहाँ तक कि प्रदेश के सिनेमाघर के भी कुछ निश्चित सप्ताह तक प्रादेशिक फिलिमनि के प्रदर्शन खातिर बाध्य क देले, ओइसही बिहारो सरकार करे त निश्चित रूप से अधिक से अधिक लोग एह क्षेत्र में आई, अधिक से अधिक फिल्म के निर्माण होई, सरकार के आर्थिक लाभ होई, नया प्रतिभा के चांस मिली। रोजगार मिली। सभका फायदा होई। पता ना ई बात सरकार के काहें नइखे बुझात।
अभी जे ही फिल्म बनावत बा, ऊ अपना पूंजी से बनावत बा। कम पूँजी में बनल एह फिल्म के सामना सीधे करोड़ो के बजट में बनल हिन्दी फिल्म से हो जाता। एगो कहावत बा कि जतने गुड़ डालब, ओतने मीठ होई। स्वाभाविक बा हिन्दी फिल्म ज्यादा कलरफूल होई। अब जबकि टिकट के दाम हिन्दी, भोजपुरी दूनू खातिर एकही बा, लोग हिन्दी के स्टार के लेके बड़ा पैमाना पर बनावल गइल मल्टीस्टार आ स्टिरियोफोनिक साउंडवाली हिन्दी फिल्म देखे जाई कि भोजपुरी। स्वाभाविक बा भोजपुरी फिल्म के कड़ा संघर्ष के सामना करें के पड़ता। अइसन स्तिथि में सरकार के सहयोग नितांत आवश्यक बा।
भावुक-'मोहन जी' , उत्तर प्रदेश सरकार त एह दिशा में महत्वपूर्ण आ सराहनीय कदम उठवले बिया, जइसे कि प्रदेश में क्षेत्रीय भाषा में बने वाली फिल्म के निर्माण के लागत के 25% अनुदान के रूप में दीहल जाई। फिल्म के 75% से अधिक शूटिंग प्रदेश में कइला पर मनोरंजन कर में शत-प्रतिशत छूट दीहल जाई। प्रदेश में आउट डोर शूटिंग करें वाली यूनिट के रियायती दर पर आवासीय सुविधा आ पर्यटन विभाग के होटल आ मोटल्स के कमरा के किराया 25 प्रतिशत तक के छूट दीहल जाइइ। फिल्म निर्माण खातिर विशिष्ट सुरक्षा उपलब्ध करावल जाई आदि-आदि। कई गो महत्वपूर्ण बिन्दु बा, उत्तर प्रदेश फिल्म नीति के । त का एकर प्रभाव भोजपुरी फिल्म निर्माण पर ना पड़ी?
मोहन जी- बिल्कुल-बिल्कुल पड़ी। हमरा समझ से फिल्म निर्माण के दर में बढ़ोतरी होई। उत्तर प्रदेश सरकार के एह नया फिल्म नीति से कम से कम ओह लोग में त एगो नया चेतना आ नया जोश के संचार भइले बा, जे लोग उत्तर प्रदेश में फिल्म निर्माण से जुड़ल बा। बिहार सरकार के भी एह दिशा में पहल करें के चाहीं।
भावुक- मोहन जी, अंतिम सवाल, राउर आगे के का योजना बा?
मोहन जी- 'संइया हमार' पर्दा पर बा। अच्छा व्यवसाय कर रहल बा।' संइया से कर द मिलनवा हाय राम' के शूटिंग चलता। जदि इहो सफल हो गइल आ क्षेत्र बनल त फेर बनाइब।हमार त इहे इच्छा बा कि हर साल एगो भोजपुरी फिल्म बनाई आ अगर स्थिति अनुकूल रहल त हम हर साल एगो भोजपुरी फिल्म बनाइब।
दूइये दिन के मुलाकत बाकिर अइसन बुझात रहे जइसे बरिसन के पहचान होखे। मोहन जी के बात-विचार आ व्यवहार से उहाँ के प्रति अइसन आत्मीयता हो गइल रहे कि उहाँ के पास से हटे के मन ना करत रहे। समय बहुत हो गइल रहे। बात के लर टूटते ना रहे बाकिर रात के सवा दस बज गइल रहे। हमनी उहाँ के धन्यवाद देत आ भोजपुरी सिनेमा के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करें के शुभकामना देत 'मंजू महल' से विदा भइनी।